छिबरामऊ: कन्नौज विधि का शासन बनाये रखने के लिये निर्भीक एवं स्वतंत्र न्याय के तंत्र का होना अति आवश्यक है। अधिवक्ता न्याय के रथ का पहिया माना जाता है व उसे Officer of the Court का दर्जा प्राप्त होता है।
बाबा साहब अम्बेडकर ने संवैधानिक उपचारों को संविधान की आत्मा माना था। इन उपचारों की परिकल्पना अधिवक्ताओं के बगैर संभव नहीं हैं। नीति-निर्देशक तत्वों में यह राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यवस्थापिका को न्यायपालिका से अलग रखने के लिये प्रतिबंद्ध रहेगा। ऐसा लगता है कि अधिवक्ता अधिनियम में संशोधन संविधान के इसी आधारभूत संरचना पर हमला करने की नियत से लाये गये हैं।
ऐसे समय में जब केन्द्रीय विधि मंत्री, अधिवक्ताओं के लिये मेडिक्लेम / जीवन बीमा प्रदान करने की घोषणा कर चुके हैं व पूरे देश का अधिवक्ता समाज एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट की राह जोट रहा था, जिसका प्रारूप तैयार करके बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश द्वारा लगभग 6 माह पूर्व सरकार को प्रेषित किया जा चुका है। इन संशोधनों में इस बिन्दु का वर्णन तक न होने से अधिवक्ताओं में मायूसी की लहर छा गयी है। साथ ही इन संशोधनों के स्वरूप, लक्षण व नियत पर प्रश्नचिन्ह स्वाभाविक रूप से उठ खड़े हुए हैं। राजस्थान के विधान मंडल द्वारा पारित एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट को राज्यपाल ने राष्ट्रपति की सहमति न प्रदान होने के कारण रोक दिया गया है, जिससे पता चलता है कि वर्तमान सरकार एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट पारित नहीं करना चाहती है। इन संशोधनों द्वारा अधिवक्ताओं की सर्वोच्च संस्था भारतीय विधिज्ञ परिषद को केन्द्र सरकार द्वारा बाध्यकारी निर्देश देने के प्राविधान से धारा 49 (बी) से पूरी संस्था की स्वायत्तता व स्वतंत्रता खतरे में आ गयी है। इतिहास साक्षी है कि अधिवक्ता समाज लोकतन्त्र का अनन्य व सजग प्रहरी है, चाहे देश का स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन हो या आपातकाल की विभीषिका अधिवक्ताओं ने ही लोकतन्त्र को अक्षुण्ण बनाये रखा है। शासन की नियत या निर्देशन जो भी हो, वह सर्वोच्च संस्था को पंगु बनाने के लिये एक खतरनाक शुरूआत है।
सर्वोच्च संस्था के निर्वाचित स्वरूप का जानबूझकर क्षरण किया गया है। भारतीय विधिज्ञ परिषद में 5 नामित सदस्यों का प्राविधान संस्था में अनावश्यक व किसी साजिश की ओर संकेत करता है। साथ ही Special Public Grievance Redressal Committee द्वारा परिषद के सभी सदस्य व पदाधिकारियों पर एक 5 सदस्यीय कमेटी का शिकंजा रखा गया है। परिषद के सदस्यों की जगह उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति की अध्यक्षता में कमेटी को सौंपे जाने का प्राविधान किया गया है। स्पष्ट है कि स्वायत्तशासी राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर पर स्वायत्तशासी संस्था का लोकतान्त्रिक अस्तित्व एक झटके में खत्म करने का प्राविधान इन संशोधन में है। इस भयावह काले कानून के विरोध में पूरे देश का अधिवक्ता लामबंद हो गया हैं। यह संशोधन आम जनता की न्याय की आस को भी धूल धूसरित कर देगा। अतः हम पूरे प्रदेश के अधिवक्ता मांग करते हैं कि एडवोकेट अमेंडमेंड बिल-2025 को तुरन्त वापस लिया जाये, अन्यथा अधिवक्ता गण पूरे देश में इस लड़ाई को लड़ने की रणनीति बनाने पर बाध्य होंगे। बार एसोसिएशन अध्यक्ष महामंत्री की मौजूदगी में अध अधिवक्ताओं ने लिखित ज्ञापन उप जिला अधिकारी को सोपा